कल्पना कीजिए एक ऐसे बिजनेस की, जिसमें आपको सोने की फुर्सत न मिले, जहां कोई छुट्टी न हो और न ही मौसम खराब होने का कोई बहाना चले। गोपालगंज के कृष्णा चंद प्रसाद ने कुछ ऐसा ही जोखिम उठाया। खाद का अपना जमा-जमाया काम छोड़कर उन्होंने लेयर फार्मिंग (Layer Farming) यानी मुर्गी पालन की शुरुआत की। 10 हजार मुर्गियों से शुरू किया गया यह सफर आज 3000 की कैपेसिटी वाले एक सफल फार्म में बदल चुका है। आइए जानते हैं अंडा उत्पादन के इस 'जागते हुए बिजनेस' की पूरी सच्चाई।
5 मुख्य बातें
- गोपालगंज के कृष्णा चंद ने 2019 में लेयर फार्मिंग बिजनेस की शुरुआत की थी।
- इस फार्म में मुर्गियां 140 दिन के बाद अंडे देना शुरू कर देती हैं।
- एक मुर्गी को अंडे पर लाने का खर्च 350 से 400 रुपये के बीच आता है।
- एक लेयर फार्म बनवाने में प्रति बर्ड्स के हिसाब से 400 रुपये का खर्च आता है।
- इस बिजनेस में छुट्टी या आराम की कोई गुंजाइश नहीं होती, यह एक 'जागता हुआ व्यापार' है।
फार्म की बनावट और साफ-सफाई (Bio-Security)
लेयर फार्मिंग शुरू करने के लिए जगह का चुनाव सबसे अहम है। फार्म गांव से दूर, बंजर या ऊसर जमीन पर होना चाहिए जहां रोड और बिजली की अच्छी सुविधा हो। फार्म की दिशा पूरब-पश्चिम होनी चाहिए ताकि हवा का दबाव कम रहे और छत टिन या सीमेंट की चादर की होनी चाहिए।
सबसे खास बात है साफ-सफाई। कृष्णा चंद के फार्म में आपको एक भी मक्खी नजर नहीं आएगी, जबकि आमतौर पर पोल्ट्री फार्म्स में मक्खियों और बदबू की बहुत शिकायत होती है। इसका कारण है मुर्गियों की बीट (Waste) का मैनेजमेंट। उन्होंने इसे लिक्विड (तरल) रूप में बदल दिया है जिसे सीधे टैंक से बाहर खेतों में जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही, बाहरी लोगों का फार्म में आना सख्त मना है ताकि मुर्गियां किसी भी तरह के 'वायरल' या बीमारी की चपेट में न आएं।
मुर्गियों की फीडिंग और अंडा उत्पादन का गणित
मुर्गियों को पहले दिन से ही बहुत देखभाल की जरूरत होती है। शुरुआत के 70 दिनों तक उन्हें जमीन पर पाला जाता है। खाने में उन्हें पहले 'स्टार्टर' और फिर 60 दिन के बाद 'ग्रोवर' दाना दिया जाता है। साफ पानी और साफ दाना मुर्गियों के बेहतर स्वास्थ्य की सबसे बड़ी गारंटी है।
करीब 140 दिनों के बाद मुर्गियां अंडे पर आ जाती हैं। कृष्णा के फार्म में 'स्काई लार्क' और 'बैंको' ब्रीड (Breed) की मुर्गियां हैं। एक मुर्गी को अंडे देने लायक बनाने में करीब 350 से 400 रुपये का खर्च आता है। अंडे देने वाली एक मुर्गी रोजाना करीब 4 रुपये का दाना खाती है। फार्म में 12 घंटे का फीडिंग शेड्यूल होता है—सुबह 4 बजे और शाम को 4 बजे।
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लेयर फार्मिंग में जोखिम और सावधानियां
कृष्णा चंद कहते हैं, "यह एक म-जगता (जागता हुआ) बिजनेस है। अगर आप सोचें कि सोकर इसे चला लेंगे, तो यह संभव नहीं है।" मुर्गियों के दाना-पानी में पांच मिनट की भी देरी नहीं होनी चाहिए। अगर फार्म में पानी की मोटर जल जाए या बिजली कट जाए, तो उसे तुरंत ठीक करना पड़ता है। आप मुर्गियों को चापाकल का पानी नहीं दे सकते और न ही लालटेन जलाकर काम चला सकते हैं।
| क्या करें | क्या न करें |
| बायो-सिक्योरिटी (Bio-security) का पूरा ध्यान रखें। | फार्म के अंदर बाहरी लोगों को बिल्कुल प्रवेश न दें। |
| मुर्गियों के दाना और पानी के समय का सख्ती से पालन करें। | मौसम खराब होने या छुट्टी का बहाना न बनाएं। |
| हर तीसरे दिन एंटीबायोटिक दवाओं का छिड़काव करें। | गंदे पानी या खराब क्वालिटी का दाना बिल्कुल न दें। |
अगर मौसम बदल रहा हो, खासकर मार्च के महीने में, तो हवा के जरिए कई बीमारियां (वायरल) आ सकती हैं। इसके बचाव के लिए नियमित रूप से दवाओं का छिड़काव करना बेहद जरूरी है। थोड़ी सी भी लापरवाही आपकी सारी पूंजी को रातों-रात 'जीरो' कर सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
लेयर फार्मिंग में एक मुर्गी कितने दिन में अंडे देने लगती है?
लेयर फार्मिंग में सही दाना और देखभाल मिलने पर मुर्गी लगभग 140 दिन के बाद अंडे देना शुरू कर देती है।
एक मुर्गी को अंडे पर लाने का खर्च कितना आता है?
पहले दिन से लेकर 140 दिन (अंडे देने तक) तक एक मुर्गी को पालने का खर्च लगभग 350 से 400 रुपये आता है।
अंडे देने वाली मुर्गी 1 दिन में कितने रुपये का दाना खाती है?
अंडे देने वाली एक मुर्गी रोजाना औसतन 4 रुपये का दाना (फीडिंग) खाती है।
लेयर फार्म बनवाने में कितना खर्च आता है?
एक नया लेयर फार्म बनवाने में प्रति बर्ड (मुर्गी) के हिसाब से लगभग 400 रुपये का स्ट्रक्चरल खर्च आता है।
क्या लेयर फार्मिंग के लिए सरकार सब्सिडी या लोन देती है?
शुरुआत में बैंक आसानी से लोन नहीं देते। आपको अपनी प्रॉपर्टी या पैसे से शुरुआत करनी होती है, बाद में टर्नओवर देखकर बैंक सीसी (CC) लोन दे सकते हैं।
कृषि एवं व्यापार अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख गोपालगंज के एक लेयर फार्मर के व्यक्तिगत अनुभव और उनके फार्म के मैनेजमेंट पर आधारित है। लेयर फार्मिंग में लागत, उत्पादन और मुनाफा बाजार के रेट (Market Rates) और बीमारियों के प्रकोप पर निर्भर करता है। पोल्ट्री बिजनेस शुरू करने से पहले नाबार्ड (NABARD) जैसी संस्थाओं से ट्रेनिंग और विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह जरूर लें।










