यह कहानी आज से करीब 30-35 साल पहले उत्तर प्रदेश के एक शहर से शुरू होती है। वहां एक बेहद गरीब परिवार रहता था। पति रिक्शा चलाकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करता था और पत्नी दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा और बर्तन मांजने का काम करती थी। उनकी एक 14-15 साल की मासूम बेटी भी थी।
एक दिन पत्नी की तबीयत बहुत खराब हो गई। उसने अपनी बेटी से कहा कि आज उसकी जगह वह काम पर चली जाए। मां की मदद करने के लिए वह मासूम बच्ची उन घरों में काम करने चली गई। दो-तीन दिन तक लगातार वह काम पर जाती रही।
जिस एक घर में वह काम करने गई थी, वहां दो अमीर भाई रहते थे। उस दिन वे दोनों शराब के नशे में धुत थे और अपना होश खो बैठे थे। जब उन्होंने उस अकेली बच्ची को काम करते देखा, तो दोनों ने मिलकर उस 14-15 साल की मासूम के साथ दरिंदगी की। उस घिनौने काम के बाद उन रसूखदार भाइयों ने बच्ची को धमकी दी कि अगर उसने किसी को भी यह बात बताई, तो वे उसके माता-पिता और उसे गोली मार देंगे। बच्ची इतनी डरी हुई थी कि उसने अपने माता-पिता की जान की खातिर होंठ सिल लिए और किसी को कुछ नहीं बताया।
समय बीतता गया। करीब दो-तीन महीने बाद पता चला कि उस दरिंदगी की वजह से वह बच्ची गर्भवती (Pregnant) हो गई है। जब मां ने बेटी के शरीर में बदलाव देखे, तो पहले उसे लगा कि शायद खाने-पीने की वजह से है। लेकिन जब शक गहराया, तो उसने बेटी को दो-चार थप्पड़ मारकर सच उगलवाया। रोते हुए बेटी ने पूरी खौफनाक दास्तान अपनी मां को सुना दी।
यह सुनकर रिक्शे वाले और उसकी पत्नी के पैरों तले जमीन खिसक गई। वे अंदर तक टूट गए क्योंकि जिन लड़कों ने यह किया था, वे शहर के बहुत अमीर और रसूखदार लोग थे। उस जमाने में एक गरीब रिक्शे वाले की औकात नहीं थी कि वह उन अमीरों से टक्कर ले सके या पुलिस में शिकायत कर सके।
बदनामी और खौफ के मारे वे अपना शहर छोड़कर यूपी में ही 300-400 किलोमीटर दूर किसी दूसरे शहर की झुग्गी-झोपड़ी में जाकर रहने लगे। मां-बाप ने बेटी से बहुत मिन्नतें कीं कि वह इस बच्चे को जन्म न दे, क्योंकि बिना बाप के इस बच्चे को समाज कभी नहीं अपनाएगा। लेकिन वह बच्ची नहीं मानी। उसने रोते हुए कहा, "अगर आपने मुझे रोका, तो मैं अपनी नस काट लूंगी।" हारकर माता-पिता को झुकना पड़ा और उस बच्ची ने एक बेटे को जन्म दिया।
जब बच्चा एक-डेढ़ साल का हुआ, तो माता-पिता को बेटी की शादी की चिंता सताने लगी। इस बच्चे के साथ उसकी शादी कभी नहीं हो पाती। उन्होंने बेटी को बहुत समझाया कि वे अब बूढ़े हो रहे हैं, उसके भविष्य के लिए इस बच्चे को अनाथ आश्रम में देना ही होगा। बहुत रोने और तड़पने के बाद बेटी इस शर्त पर मानी कि वह महीने-छह महीने में अपने बच्चे से मिलने जाएगी। भारी मन से उस बच्चे को अनाथ आश्रम के हवाले कर दिया गया।
किस्मत का खेल देखिए, उसी अनाथ आश्रम में एक बहुत बड़े व्यापारी (सेठ-सेठानी) ने अपना नाम लिखवा रखा था कि अगर कोई बच्चा आए, तो उन्हें गोद दे दिया जाए क्योंकि उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। जैसे ही यह बच्चा वहां पहुंचा, अनाथ आश्रम वालों ने सेठ जी को फोन किया और वे तुरंत आकर उस बच्चे को कानूनी रूप से गोद ले गए।
20 साल बाद... समय का पहिया घूमा
इस घटना को 20-21 साल गुजर गए। वह एक साल का बच्चा अब 21-22 साल का गबरू जवान हो चुका था। सेठ-सेठानी ने उसे इतना प्यार दिया था कि उसे कभी एहसास ही नहीं हुआ कि वह उनकी सगी औलाद नहीं है।
लेकिन एक दिन, सेठ और सेठानी अपने कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। उन्हें लगा कि उनका बेटा कॉलेज गया है, पर वह घर पर ही था और कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला था। सेठ जी ने भावुक होकर अपनी पत्नी से कहा, "भगवान ने हमें कैसा फरिश्ता दिया है। शायद हमारी अपनी सगी औलाद भी हमसे इतना प्यार नहीं करती, जितना यह बच्चा करता है, जबकि यह हमारा अपना खून भी नहीं है।"
दरवाजे के बाहर खड़े 22 साल के उस लड़के ने जब यह सुना, तो उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। वह रोता हुआ अंदर गया और अपने माता-पिता की कसम देकर सच पूछा। मजबूरी में सेठ जी को बताना पड़ा कि वे उसके असली माता-पिता नहीं हैं, बल्कि उसे अनाथ आश्रम से गोद लिया गया था।
लड़के ने सेठ जी से कहा, "पापा, मैं आपको कभी छोड़कर नहीं जाऊंगा, लेकिन मुझे यह जानना है कि मुझे जन्म देने वाले मेरे असली माता-पिता कौन हैं?" सेठ जी ने उसे उस अनाथ आश्रम का पता दे दिया।
असली मां की तलाश
वह लड़का अनाथ आश्रम पहुंचा। 20 साल पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए। रजिस्टर में उस सेठ का नाम था और साथ ही उस रिक्शे वाले (नाना), उसकी पत्नी (नानी) और उस लड़की (मां) का नाम और पुराना पता दर्ज था।
लड़का उस पुराने पते पर पहुंचा। वहां पता चला कि रिक्शे वाले की एक एक्सीडेंट में मौत हो चुकी है, उसकी पत्नी बीमार रहने लगी थी और उन्होंने अपनी बेटी की किसी दूसरे मोहल्ले में शादी कर दी थी। पागलों की तरह 10-15 घर खंगालने के बाद, आखिरकार वह लड़का अपनी असली मां के दरवाजे तक पहुंच गया।
उसने बेल बजाई। एक महिला बाहर आई। न वह महिला उस लड़के को पहचानती थी, न वह लड़का उस महिला को। लड़के ने पूछा, "क्या आप रीना (काल्पनिक नाम) जी हैं?" महिला ने कहा, "हां, मैं ही हूं।"
लड़का तुरंत उस महिला के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा। महिला घबरा गई। लड़के ने उठकर कहा, "क्या मैं आपको एक बार गले लगा सकता हूं?" महिला ने झिझकते हुए कहा, "मैं आपको जानती तक नहीं, गले कैसे लगा लूं?" तब उस लड़के ने रोते हुए कहा, "मां... 9 महीने पेट में रखा था मुझे। मेरा दिल आज भी तेरे लिए धड़कता है।"
यह सुनते ही उस मां के दिमाग के तार झनझना गए। 20 साल पहले अनाथ आश्रम में छोड़ा गया उसका जिगर का टुकड़ा आज उसके सामने खड़ा था। दोनों मां-बेटे गले लगकर फूट-फूटकर रोए।
पिता का सच और अदालत का दरवाजा
मां उसे अंदर ले गई, लेकिन लड़के ने पानी तक पीने से मना कर दिया। उसकी आंखों में बस एक ही सवाल था- "मां, मेरे पापा कहां हैं?"
यह सवाल सुनते ही मां बुरी तरह रोने लगी। उसने सच छिपाने की कोशिश की, लेकिन जब बेटे ने कसम दी कि अगर सच नहीं बताया तो वह अपनी जान दे देगा, तब मां ने अपने दिल पर पत्थर रखकर 20 साल पुराने उस खौफनाक दिन की पूरी सच्चाई अपने बेटे को बता दी। उसने उन दोनों अमीर भाइयों का नाम और पता भी बता दिया, जिन्होंने उसकी जिंदगी बर्बाद की थी।
सच जानने के बाद बेटे का खून खौल उठा। वह सीधा कोर्ट (न्यायालय) पहुंचा और भारत के संविधान के 'अनुच्छेद 21' (Right to Life - जीने का अधिकार) के तहत केस दायर किया। उसने कोर्ट से कहा, "मुझे अपने पिता का नाम जानने का पूरा हक है।"
कोर्ट ने तुरंत उस शहर के उन दोनों नामी-गिरामी और अमीर भाइयों को हिरासत में लेने और उनका डीएनए (DNA) टेस्ट कराने का आदेश दिया। 20 साल बाद जब समय का पहिया घूमा, तो उन अमीर भाइयों के होश उड़ गए। वे पुलिस के डर से भागकर साउथ इंडिया (दक्षिण भारत) छिप गए। लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां से गिरफ्तार कर लिया।
जब डीएनए टेस्ट हुआ, तो दोनों भाइयों में से बड़ा भाई उस लड़के का असली पिता निकला।
सच सामने आने के बाद कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आदेश दिया कि उस पिता की प्रॉपर्टी और संपत्ति में से इस बेटे को उसका पूरा कानूनी हक दिया जाए।
आज से 30 साल पहले जिन अमीर भाइयों ने अपनी ताकत के घमंड में एक गरीब की जिंदगी रौंद दी थी, समय ने उन्हें उसी के बेटे के सामने घुटनों पर ला खड़ा किया। सच ही कहा गया है— इंसान जैसा कर्म करता है, उसका फल उसे यहीं इसी दुनिया में भुगतना पड़ता है।










