सोनागाछी की मिट्टी से बनती है मां की मूर्ति जानें पूरा रहस्य

क्या मां दुर्गा की मूर्ति वैश्यालय की मिट्टी के बिना अधूरी है? जानिए कोलकाता के सोनागाछी और कुमारटुली की उस पुण्य माटी का रहस्य जिसे आज भी पवित्र माना जाता है।

नवरात्रि के पावन दिनों में जब आप किसी भव्य पंडाल में मां दुर्गा के सामने सिर झुकाते हैं, तो शायद ही आप उस मूर्ति में छिपे एक गहरे रहस्य को जानते होंगे। कोलकाता में बनने वाली मां दुर्गा की मूर्ति (Durga Puja Murti) में एक मुट्ठी मिट्टी एशिया के सबसे बड़े रेड लाइट इलाके सोनागाछी से मंगवाई जाती है। इसे किसी सड़क से नहीं बल्कि सेक्स वर्कर के दरवाजे की चौखट से मांग कर लाया जाता है। बंगाल में इसे 'पुण्य माटी' यानी पवित्र मिट्टी कहा जाता है।

पुण्य माटी: पाप की गली में पवित्रता की खोज

जिस गली से समाज के लोग नजरें चुराकर निकलते हैं, वहां की धूल मां के लिए इतनी जरूरी क्यों है? इसे समझने के लिए हमें कोलकाता के कुमारटुली चलना होगा। कुमारटुली यानी कुम्हारों का मोहल्ला। यह बस्ती अंग्रेजों के जमाने की है और पिछले 300 सालों से यहां मूर्तियां गढ़ी जा रही हैं।

मां की मूर्ति बनाने के लिए पहले बांस के फ्रेम पर पुवाल बांधा जाता है। फिर उस पर हुगली नदी की चिपचिपी मिट्टी और धान की भूसी की परत चढ़ाई जाती है। इसके बाद हुगली नदी की बेले माटी, गाय का गोबर और गौमूत्र मिलाया जाता है। इसी प्रक्रिया में वह एक मुट्ठी मिट्टी भी मिलाई जाती है जिसे 'निषिद्ध पल्ली की माटी' कहते हैं। निषिद्ध पल्ली यानी वह बस्ती जहां जाना मना है।

मिट्टी के पवित्र होने के पीछे की मान्यताएं

बंगाल में दश मृतिका (10 तरह की मिट्टी) की परंपरा है। इसमें दीमक की बांबी, चौराहे, नदी के किनारे, पहाड़ की चोटी, बूचड़खाने और वैश्यालय के दरवाजे की मिट्टी शामिल होती है। इस मिट्टी को छीना नहीं जाता बल्कि पंडित बड़े आदर से इसे मांगते हैं और मंत्र पढ़ते हैं।

इस मिट्टी को पवित्र मानने के पीछे सबसे आम मान्यता यह है कि जो भी व्यक्ति उस दरवाजे के अंदर जाता है, वह अपना सारा पुण्य चौखट के बाहर ही छोड़ जाता है। इसलिए वह मिट्टी पुण्य से भर जाती है। एक अन्य पुरानी कथा के अनुसार, यह रिवाज समाज की हर तरह की औरत को मां की पूजा में शामिल करने के लिए बनाया गया होगा क्योंकि मां दुर्गा तो सबकी मां हैं।

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रात के अंधेरे में क्यों मंगवाई जाती थी मिट्टी?

अगर यह मिट्टी इतनी ही पवित्र है तो फिर इसे छुपाकर लाने की जरूरत क्या थी? कुमारटुली के कारीगर बताते हैं कि सालों तक मूर्तिकार इस मिट्टी को रात के अंधेरे में चुपचाप मंगवाते थे। कारीगर सुबह इसे अखबार में लपेटकर लाते, फिर हाथ-पैर धोकर कपड़े बदलते। उन्हें डर रहता था कि इसके बिना मूर्ति बनाई तो कुछ अनर्थ हो सकता है।

यह काम पूजा से तीन-चार महीने पहले बरसात के समय किया जाता था। अक्सर सोनागाछी की औरतें इस रिवाज से नाराज रहती थीं और कभी-कभी मिट्टी के बदले पैसे भी मांगती थीं। बड़े घरानों की पूजा में उस औरत को 101 रुपये शगुन के तौर पर दिए जाते थे।

जब सेक्स वर्कर्स ने मिट्टी देने से किया इनकार

इस कहानी में असली मोड़ अगस्त 2002 में आया। बंगाल की 60 हजार से ज्यादा सेक्स वर्कर्स का प्रतिनिधित्व करने वाली 'दुरबार महिला समन्वय कमेटी' की प्रेसिडेंट सपना गायन ने पहली बार इस रिवाज का विरोध किया। उनका कहना था कि यह परंपरा उनके समुदाय का अपमान है और वे समाज का कूड़ेदान बनकर नहीं रहना चाहतीं।

पुण्य माटी से जुड़ी मान्यताएंसेक्स वर्कर्स का दर्द
वैश्यालय के बाहर की मिट्टी पुण्य से भरी मानी जाती है।सिर्फ एक दिन के लिए पवित्र माना जाता है, बाकी साल तिरस्कार मिलता है।
इसके बिना मां दुर्गा की मूर्ति अधूरी मानी जाती है।मूर्ति का चंदा लिया जाता है, लेकिन पंडाल में घुसने की इजाजत नहीं होती।
पंडित मंत्र पढ़कर आदर के साथ मिट्टी मांगते हैं।पूजा में कभी सम्मान के साथ बुलाया नहीं जाता।

2013 में इन औरतों ने अपनी खुद की दुर्गा पूजा करने के लिए सड़क पर जगह मांगी। पुलिस ने ट्रैफिक का हवाला देकर मना कर दिया। मामला हाईकोर्ट पहुंचा और तब जाकर उन्हें अपनी पूजा करने की इजाजत मिली।

2018 और 2024 में भी कई औरतों ने यह सवाल उठाया कि जब मूर्ति हमारे आंगन की मिट्टी से बनती है, तो हमें पंडालों में जाने से क्यों रोका जाता है? जब मिट्टी पवित्र है तो फिर हम अपवित्र कैसे हो गए? यह एक ऐसा सवाल है जो आज भी समाज के दोहरे मापदंडों पर चोट करता है। अगली बार जब आप किसी पंडाल में सिर झुकाएं तो जरूर सोचिएगा कि जिस मां के लिए सबके दरवाजे खुले हैं, क्या उसकी पूजा में उन बेटियों के लिए जगह नहीं होनी चाहिए?

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

दुर्गा पूजा की मूर्ति में वैश्यालय की मिट्टी क्यों मिलाई जाती है? मान्यता है कि वैश्यालय जाने वाला व्यक्ति अपना पुण्य दरवाजे के बाहर छोड़ जाता है, जिससे वहां की मिट्टी पवित्र (पुण्य माटी) हो जाती है। इसके बिना मूर्ति अधूरी मानी जाती है।

कोलकाता में मां दुर्गा की मूर्तियां कहां बनती हैं? कोलकाता की ज्यादातर भव्य मूर्तियां कुमारटुली (कुम्हारों की बस्ती) में बनती हैं। यह बस्ती करीब 300 साल पुरानी है।

दश मृतिका क्या है? बंगाल की परंपरा के अनुसार मूर्ति बनाने में 10 अलग-अलग तरह की मिट्टी (जैसे नदी का किनारा, पहाड़ की चोटी, चौराहा आदि) मिलाई जाती है जिसे दश मृतिका कहते हैं।

सेक्स वर्कर्स ने मिट्टी देने से क्यों मना किया था? उन्होंने इस बात का विरोध किया था कि समाज सिर्फ मूर्ति बनाने के लिए उनकी मिट्टी को पवित्र मानता है लेकिन उन्हें कभी पूजा के पंडालों में सम्मान के साथ नहीं बुलाया जाता।

क्या सेक्स वर्कर्स अपनी दुर्गा पूजा कर सकती हैं? हां, 2013 में एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन्हें अपनी दुर्गा पूजा आयोजित करने की अनुमति दी थी।

सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख कोलकाता की कुमारटुली और सोनागाछी से जुड़ी पुरानी मान्यताओं, ऐतिहासिक कथाओं और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में दुर्गा पूजा की परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं। हमारा उद्देश्य किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक मान्यता की जानकारी देना है।

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