श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में राजा कंस के कारागार में हुआ था, जब यमुना नदी में भयंकर तूफान और लहरें उफान पर थीं। मूसलाधार बारिश और तूफान के बीच, उनके पिता नवजात श्रीकृष्ण को एक टोकरी में रखकर बिना रुके आगे बढ़े। ईश्वरीय शक्ति के कारण यमुना की लहरें उनके पिता को रोक नहीं पाईं और शेषनाग ने खुद बारिश की बूंदों से श्रीकृष्ण की रक्षा की। यमुना पार करके उनके पिता ने उन्हें अपने मित्र नंद को सौंप दिया और इस तरह श्रीकृष्ण गोकुल पहुंचे, जिसे आज जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।
बांसुरी का निर्माण और उसका टूटना
श्रीकृष्ण की बांसुरी प्रेम की ध्वनि थी, जिससे मनुष्य, जानवर और पूरी प्रकृति मंत्रमुग्ध हो जाती थी।
- एक दिन श्रीकृष्ण को बांसुरी की आवश्यकता महसूस हुई और उन्होंने अपने बगीचे में एक बांस के पेड़ से कहा कि वह उससे बांसुरी बनाना चाहते हैं, जिसके लिए पेड़ को काटना और उसमें छेद करना पड़ेगा।
- बांस के पेड़ ने कहा कि उसकी पहचान भगवान से है और वह हर रूप स्वीकार करेगा।
- श्रीकृष्ण ने अपने हाथों से वह बांसुरी बनाई और उसमें अपने प्राण फूंके।
- इस मधुर ध्वनि के कारण उन्हें 'मुरली मनोहर' और 'बंसी बजैया' कहा जाने लगा।
- राधा रानी और अन्य गोपियां इस बांसुरी से ईर्ष्या करती थीं क्योंकि श्रीकृष्ण इसे हमेशा अपने साथ रखते थे।
- जब राधा रानी का शरीर त्यागने का समय आया, तो उन्होंने श्रीकृष्ण से उनकी पसंदीदा बांसुरी बजाने को कहा।
- श्रीकृष्ण ने एक मधुर लेकिन दर्द भरी धुन बजाई और राधा के जाने के बाद अपनी बांसुरी तोड़कर यमुना के किनारे छोड़ दी।
राधा रानी ने पहली बार कैसे खोली आंखें?
राधा और कृष्ण का प्रेम ऐसा है जिसे कोई पूरी तरह नहीं समझ पाया।
- माता यशोदा अपनी सहेली कीर्ति के घर गईं, जिन्होंने कुछ महीने पहले एक बेटी को जन्म दिया था।
- वह बच्ची फूल जैसी कोमल और सोने की तरह चमक रही थी, लेकिन कीर्ति दुखी थीं क्योंकि उनकी बेटी ने जन्म से अपनी आंखें नहीं खोली थीं।
- जब माता यशोदा और कीर्ति बात कर रही थीं, तब बाल कृष्ण उस बच्ची के पालने के पास पहुंचे और अपने छोटे पैरों पर खड़े होकर उसे देखने की कोशिश की।
- जब माता यशोदा विदा लेने लगीं, तो उन्होंने देखा कि वह बच्ची अपनी बड़ी-बड़ी आंखें खोलकर मुस्कुरा रही थी।
- वह बच्ची कोई और नहीं बल्कि राधा रानी थीं, जिन्होंने पहली बार आंखें खोलकर केवल श्रीकृष्ण को देखा और उनकी छवि में खो गईं।
- राधा कहती थीं, "मैं कृष्ण में बसती हूं और वह मुझमें बसते हैं"।
- इसी कारण कृष्ण के बिना राधा और राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं।
ब्रह्मा जी का परीक्षण और 'गोपाल' का अर्थ
भगवान के रूप को हमेशा एक महान ऋषि, योद्धा या राजा के रूप में देखा जाता था।
- जब ब्रह्मा जी ने विष्णु जी के आठवें अवतार को एक साधारण ग्वाले के रूप में बांसुरी बजाते और गाय चराते देखा, तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ।
- श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने के लिए, ब्रह्मा जी ने सभी ग्वालों और गायों को गायब कर दिया और उन्हें अपने साथ ब्रह्मलोक ले गए।
- हजारों साल बाद जब ब्रह्मा जी वापस धरती पर आए, तो उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण, उनके साथी और गायें बिल्कुल वैसे ही मौजूद हैं।
- श्रीकृष्ण ने उन्हें सच्चाई दिखाई कि वह गायें, ग्वाले, गायों को बांधने वाली रस्सी और वह पेड़ जिसके नीचे वे बैठे थे—सब कुछ स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं।
- ब्रह्मा जी ने अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी।
- गायों की रक्षा करने वाले इस रूप के कारण ही श्रीकृष्ण को 'गोपाल' कहा गया।
इंद्र का क्रोध और 'गोविंद' बनने की कथा
गोकुल के लोग हर साल अच्छी बारिश और खेती के लिए भगवान इंद्र की पूजा करते थे।
- श्रीकृष्ण ने नंद महाराज से कहा कि बारिश प्रकृति का नियम है और भोजन गोवर्धन पर्वत से मिलता है, इसलिए इंद्र के बजाय गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए।
- नंद महाराज और ग्रामीणों ने बात मानकर गोवर्धन पर्वत की पूजा की और ब्राह्मणों को भोजन कराया।
- इससे अपमानित और क्रोधित होकर भगवान इंद्र ने गोवर्धन पर काले घने बादल और भयंकर तूफानी हवाएं भेज दीं।
- पूरी गोकुल बारिश और तूफान में फंस गई, जिसके बाद सभी लोग, गायें और जानवर मदद के लिए श्रीकृष्ण के पास आए।
- श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए लोगों से आंखें बंद करने को कहा और अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया।
- अगले 7 दिनों तक उन्होंने पर्वत को उठाए रखा और गोकुलवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया।
- अंततः, इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ, उन्होंने मौसम ठीक किया और श्रीकृष्ण से माफी मांगी।
- इसी दिन से गोपाल, 'गोविंद' कहलाने लगे।

