जरा सोचिए—अगर कोई अच्छी-खासी रिसर्च की नौकरी छोड़कर अपना खरीदा हुआ मकान बैंक में गिरवी रख दे, और वह भी सिर्फ पेड़ की पत्तियां बेचने के लिए, तो घरवाले क्या कहेंगे? जब डॉ. कामिनी सिंह ने यह कदम उठाया, तो उनके अपने परिवार ने उन्हें 'पागल' करार दे दिया और पूरे 2 साल तक उनसे बात तक नहीं की। गांव के जिन किसानों की भलाई के लिए वे जाती थीं, वे उन्हें देखते ही अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे।
लेकिन आज वही किसान अपने खेत लेकर उनके पीछे खड़े रहते हैं। आज के दौर में मोरिंगा की खेती से कमाई ( सहजन की खेती) ने उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के किसानों की तकदीर बदल दी है। बिहार के कैमूर जिले से निकलकर लखनऊ पहुंचीं डॉ. कामिनी सिंह ने कैसे सहजन (Moringa) के पत्तों से एक सफल कृषि साम्राज्य खड़ा किया और महिला किसानों को आत्मनिर्भर बनाया? आइए, इस प्रेरक और आंखें खोल देने वाली कहानी को विस्तार से समझते हैं।
कैमूर में पिता की हत्या और लखनऊ में नई जिंदगी की जंग
डॉ. कामिनी सिंह की यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। उनका जन्म बिहार के कैमूर जिले के एक संपन्न किसान और राजनीतिक परिवार में हुआ था। लेकिन साल 1999-2000 में चुनाव से ठीक एक दिन पहले उनके पिता की हत्या कर दी गई।
पिता के जाने के बाद परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा और विरोधियों की धमकियों के चलते उनकी मां को अपने छोटे-छोटे बच्चों की जान बचाने के लिए बिहार छोड़कर लखनऊ शिफ्ट होना पड़ा। कामिनी ने लखनऊ से अपनी एमएससी (M.Sc) और फिर इलाहाबाद डीम्ड यूनिवर्सिटी से कृषि में पीएचडी (PhD) पूरी की।
साल 2008 में उनकी पहली नौकरी लगी, लेकिन जब उन्होंने देखा कि बड़ी कंपनियां किसानों की मेहनत से करोड़ों कमाती हैं और किसान को मुनाफे का सिर्फ 2% हिस्सा मिलता है, तो उन्होंने 2015 में नौकरी छोड़ दी। उनका सपना साफ था—एक ऐसी कंपनी बनाना जिसका असली मालिक खुद किसान हो!
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जब मकान पर लिया लोन और ₹40 की पत्ती को बनाया ₹1000 किलो का सोना!
साल 2017 में कामिनी और उनके पति ने मिलकर 'जैविक विकास कृषि संस्थान' की नींव रखी और फंड जुटाने के लिए इंदिरा नगर (लखनऊ) स्थित अपने मकान पर लोन ले लिया। शुरुआती दौर में सरकारी फंड के भरोसे काम करने वाले किसानों ने साथ नहीं दिया और काम फेल होने लगा।
तब उन्होंने एक ऐसी फसल चुनी जिसमें न के बराबर खाद-पानी लगता हो और जो यूपी, बिहार, राजस्थान, एमपी से लेकर दक्षिण भारत तक हर मिट्टी में आसानी से उग जाए—और वह फसल थी 'मोरिंगा' यानी सहजन (Drumstick)!
- पहली बड़ी चुनौती: उन्होंने सिधौली में 7 एकड़ जमीन लीज पर लेकर खेती शुरू की। जब पत्तियां तैयार हुईं, तो पता चला कि कच्ची या सूखी पत्ती को दिल्ली की मंडी भेजने में फसल की कीमत से दोगुना तो ट्रक का किराया लग रहा है!
- वैल्यू एडिशन (Value Addition) का जादू: यहीं से मोरिंगा की खेती से कमाई का असली फॉर्मूला निकला। उन्होंने चक्की पर सूखी पत्तियों को पिसवाकर उसका पाउडर बनवाया और छोटे-छोटे पाउच में पैक किया। जो सूखी पत्ती थोक में मात्र ₹40 से ₹50 किलो बिक रही थी, पाउडर बनने के बाद जोड़ों के दर्द और पेट के इलाज के रूप में ₹100 का 100 ग्राम (यानी ₹1000 किलो) हाथों-हाथ बिकने लगी!
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कोविड का लॉकडाउन और BHU के वैज्ञानिकों का वो वरदान!
साल 2019 में कामिनी ने 'डॉक्टर मोरिंगा' (Doctor Moringa) ब्रांड और किसान उत्पादक संगठन (FPO) की स्थापना की। साल 2020 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से उन्हें ₹5 लाख का ग्रांट (अनुदान) मिला, जिससे उन्होंने प्रोसेसिंग की छोटी मशीनें खरीदीं। लेकिन तभी अचानक कोविड-19 का लॉकडाउन लग गया!
ऑफिस और स्टाफ सब बंद हो गए और लगा कि अब दुकान हमेशा के लिए बंद हो जाएगी। लेकिन उसी संकट के समय BHU के रिसर्च पेपर्स में यह प्रकाशित हुआ कि मोरिंगा (सहजन) इम्यूनिटी को तेजी से बूस्ट करता है और कोरोना से बचाव में बेहद कारगर है।
डॉ. कामिनी ने तुरंत मौके को पहचाना और काढ़े के विकल्प के तौर पर 'मोरिंगा टी' (Moringa Tea) लॉन्च कर दी। लोगों को इसके जबरदस्त स्वास्थ्य लाभ मिले और देखते ही देखते लॉकडाउन के बीच ही उनका बिजनेस रॉकेट की रफ्तार से दौड़ पड़ा!
एक पेड़ से 15 साल तक कमाई और 67% महिला किसानों को मिला हक
भारत में आज भी खेतों में 67% काम महिलाएं करती हैं, लेकिन खेत हमेशा पुरुषों (रामू या श्यामू) के नाम से जाना जाता है। डॉ. कामिनी ने नियम बनाया कि उनके FPO में जो महिला खेत में काम करेगी, पहचान भी उसी के नाम से होगी और फसल का पैसा भी सीधे उसी महिला के बैंक खाते में जाएगा!
पारंपरिक खेती बनाम मोरिंगा (सहजन) की खेती का मुनाफा (Comparison Table)
| खेती का पैरामीटर | धान और गेहूं की पारंपरिक खेती | मोरिंगा (सहजन) की आधुनिक खेती |
| 1 एकड़ से सालाना शुद्ध बचत | मात्र ₹25,000 से ₹30,000 सालाना। | पुरानी फसल के साथ ₹1 लाख से ₹1.5 लाख सालाना। |
| फसल का जीवनकाल और कटाई | हर 4-6 महीने में दोबारा बुवाई और जुताई का खर्च। | 1 बार लगाने पर 15 साल तक फसल; हर 45 दिन में कटाई। |
| पौधे के किस हिस्से से कमाई? | केवल अनाज और भूसा बिकता है। | पत्ती (पाउडर/चाय), फली (सब्जी), डंठल (पशु चारा) और छाल (औषधि)। |
| मौसम और लागत का जोखिम | भारी बारिश में फसल डूबने और महंगे खाद का डर। | बेहद कम पानी, बिना केमिकल खाद और खेत की मेड़ पर भी संभव। |
किसानों को मोरिंगा की खेती से कमाई के लिए अपनी पारंपरिक खेती छोड़ने की भी जरूरत नहीं पड़ती:
- साल में 6 से 7 बार नकद कमाई (Cash Crop): पौधा लगाने के 3 से 4 महीने बाद पहली कटाई शुरू हो जाती है। इसके बाद हर 45 से 60 दिन पर पत्तियों की कटाई होती है और यह सिलसिला लगातार 15 सालों तक चलता रहता है।
- कचरा कुछ भी नहीं (Zero Waste): पत्तियों से हर्बल सप्लीमेंट और दवाइयां बनती हैं, फलियां बाजार में सब्जी के तौर पर महंगी बिकती हैं, बचे हुए डंठल से पौष्टिक पशु चारा (Cattle Feed) बनता है और पेड़ पुराना होने पर उसकी छाल व जड़ें आयुर्वेदिक औषधियों में बिक जाती हैं।
आज जो ग्रामीण महिलाएं पहले सिर्फ घर में झाड़ू-पोछा और बर्तन तक सीमित थीं, वे खुद कहती हैं कि डॉक्टर मोरिंगा से जुड़ने के बाद उन्हें किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती। डॉ. कामिनी सिंह ने साबित कर दिया है कि अगर खेती को थोड़ा सा विज्ञान और प्रोसेसिंग (Value Addition) से जोड़ दिया जाए, तो हजार कमाने वाला किसान भी आसानी से लाखों कमा सकता है!
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. 1 एकड़ में मोरिंगा (सहजन) की खेती से साल भर में कितनी कमाई हो सकती है?
उत्तर: यदि किसान अपनी सामान्य सब्जियों या फसलों के साथ एकीकृत खेती (Integrated Farming) के रूप में मोरिंगा लगाता है और उसकी सूखी पत्तियों व फलियों को बेचता है, तो वह 1 एकड़ से सालाना ₹1 लाख से ₹1.5 लाख रुपये तक की शुद्ध बचत आसानी से कर सकता है।
Q2. मोरिंगा के पौधे से पहली कटाई कब मिलती है और यह कितने साल तक चलता है?
उत्तर: मोरिंगा (सहजन) एक बार लगाने के बाद लगभग 15 साल तक लगातार पैदावार देता है। लगाने के 3 से 4 महीने बाद इसकी पहली पत्ती की कटाई हो जाती है, और उसके बाद हर 45 से 60 दिन के अंतराल पर कटाई की जा सकती है।
Q3. मोरिंगा पाउडर खाने से शरीर को क्या-क्या फायदे होते हैं?
उत्तर: आयुर्वेद और BHU के शोध के अनुसार, मोरिंगा (सहजन) की पत्तियों में भरपूर कैल्शियम, आयरन, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। इसके सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है, घुटनों व जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है और पेट का पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है।
कृषि एवं व्यापार अस्वीकरण (Agriculture & Business Disclaimer):
यह लेख सफल कृषि उद्यमी डॉ. कामिनी सिंह (फाउंडर, डॉक्टर मोरिंगा एवं जैविक विकास कृषि संस्थान) के वास्तविक अनुभवों और किसानों के साक्षात्कार पर आधारित है। खेती से होने वाला मुनाफा मिट्टी की गुणवत्ता, स्थानीय बाजार भाव, वैल्यू एडिशन (प्रोसेसिंग) और आपकी मार्केटिंग क्षमता पर निर्भर करता है। बड़े स्तर पर व्यावसायिक खेती शुरू करने से पहले अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या विशेषज्ञों से प्रशिक्षण और मिट्टी की जांच अवश्य कराएं।








