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iPhone 18 Pro Max: 3 चौंकाने वाली वजह, भारत में क्यों है महंगा?

19 hours ago
Mukul Kumar Mk Singh

iPhone 18 Pro Max और नए फोल्डेबल 'iPhone Duo' के लॉन्च के बाद देश में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर भारत में असेंबल होने के बावजूद आईफोन अमेरिका और अन्य देशों के मुकाबले इतने महंगे क्यों बिक रहे हैं? क्या आपने कभी सोचा है कि जिस फोन को तमिलनाडु और कर्नाटक के कारखानों में भारतीय मजदूर जोड़ रहे हैं, वही फोन अमेरिका में आधे दाम पर मिल जाता है और भारत में ग्राहकों को डेढ़ गुना ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है? इस पूरे मामले को लेकर टेक जगत में बहस छिड़ गई है कि क्या यह 'मेड इन इंडिया' के नाम पर कोई बड़ा खेल या स्कैम है। आइए आंकड़ों और टैक्स की गणित के जरिए समझते हैं कि इसके पीछे की असली सच्चाई क्या है।

भारत और अमेरिका की कीमतों में इतना बड़ा अंतर क्यों?

हाल ही में लॉन्च हुए iPhone 18 Pro Max और एप्पल के पहले मुड़ने वाले फोन 'iPhone Duo' की कीमतों ने सबको चौंका दिया है।

  • भारत में iPhone Duo का सबसे महंगा 2TB मॉडल ₹4,49,900 (लगभग साढ़े 4 लाख रुपये) में बिक रहा है, जबकि अमेरिका में इसकी कीमत काफी कम है।
  • बात करें आम फ्लैगशिप मॉडल यानी iPhone 18 Pro Max की, तो भारत में इसकी शुरुआती कीमत ₹1,79,900 है, जबकि अमेरिका में यही फोन टैक्स और अन्य चार्जेस हटाने के बाद काफी कम कीमत पर उपलब्ध होता है।
  • दुबई या अमेरिका से फोन खरीदने और भारत में खरीदने के बीच लगभग 30,000 से 50,000 रुपये तक का भारी अंतर देखने को मिलता है। यही वजह है कि आज भी लोग अपने अमेरिका या विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों से आईफोन लाने की गुजारिश करते हैं।

क्या 'मेड इन इंडिया' आईफोन सिर्फ एक स्कैम है?

सालों से देश को यह भरोसा दिलाया जा रहा था कि जब आईफोन भारत में बनने लगेंगे, तो आयात शुल्क (Import Duty) बचेगा, ढुलाई का खर्च घटेगा और भारतीय ग्राहकों को यह सस्ते दामों पर मिलेंगे। आज फॉक्सकॉन (Foxconn) और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियां तमिलनाडु और कर्नाटक में एप्पल के फोन बना रही हैं। भारत में बनने वाले फोन पर 20% की इंपोर्ट ड्यूटी भी नहीं लगती है, जो विदेशी जहाजों से आने वाले फोंस पर लगती है।

इसके बावजूद, भारत में दाम घटने के बजाय लगातार बढ़ते जा रहे हैं। जब सरकार की तरफ से कंपनियों को राहत मिल रही है, तो फिर भारत का आम ग्राहक अमेरिका के मुकाबले ₹20,000 से ₹60,000 तक एक्स्ट्रा पैसे क्यों दे रहा है? जानकारों का मानना है कि यह केवल टैक्स का खेल नहीं है, बल्कि कंपनियों द्वारा भारत को एक 'स्टेटस सिंबल' मार्केट मानकर कीमतें तय करने का तरीका है।

सरकार की PLI स्कीम और कंपनियों का फायदा

भारत सरकार देश में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए PLI (Production Linked Incentive) स्कीम चला रही है, जिसके तहत मोबाइल फोन बेचने वाली कंपनियों को 5 साल तक 4% से 6% तक की वित्तीय मदद दी जाती है। यह मदद आसमान से नहीं आती, बल्कि आम जनता द्वारा भरे गए टैक्स के पैसों से ही दी जाती है।

  • भारत में बने 100 आईफोन में से लगभग 78 आईफोन अमेरिका एक्सपोर्ट (निर्यात) कर दिए जाते हैं।
  • यानी हमारी ही मिट्टी पर, हमारे मजदूरों द्वारा बनाए गए फोन अमेरिका और पश्चिमी देशों में सस्ते बिकते हैं और भारतीय ग्राहक सबसे ज्यादा कीमत चुकाते हैं।

हालांकि, इससे भारत को यह फायदा जरूर मिला है कि देश में बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा हुई हैं और एक्सपोर्ट बढ़ा है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस मेक इन इंडिया का सीधा फायदा भारत के आम उपभोक्ता को मिल रहा है?

स्टेटस सिंबल और EMI का खतरनाक जाल

भारत में iPhone 18 Pro Max जैसी डिवाइस केवल एक गैजेट नहीं, बल्कि समाज में 'हैसियत' (Status Symbol) की निशानी बन चुकी हैं। टेक कंपनियां इस मानसिकता को बहुत अच्छी तरह समझती हैं। वे जानती हैं कि भारतीय ग्राहक शो-ऑफ के लिए अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च करने को तैयार रहते हैं।

चूंकि ₹1.5 लाख या ₹3 लाख का फोन एक बार में खरीदना आम आदमी के लिए मुमकिन नहीं होता, इसलिए बाजार में 'EMI का जाल' फैला दिया जाता है। लोग 24 महीने की आसान किस्तों (₹14,000 प्रति माह) पर फोन खरीद लेते हैं, लेकिन बैंक के 14% से 15% सालाना ब्याज को जोड़कर अंत में वे फोन की वास्तविक कीमत से हजारों रुपये ज्यादा चुका चुके होते हैं।

निष्कर्ष के तौर पर, iPhone 18 Pro Max जैसी प्रीमियम डिवाइस खरीदना गलत नहीं है, लेकिन यह सोचना छोड़ देना चाहिए कि भारत में मैन्युफैक्चरिंग होने से ये सस्ते मिलेंगे। भारत में आईफोन की कीमतें इस बात पर तय होती हैं कि यहां का ग्राहक स्टेटस के लिए कितना पैसा खर्च करने की ताकत रखता है। इस पूरी व्यवस्था पर सरकार और टेक दिग्गजों को सोचने की जरूरत है ताकि 'मेड इन इंडिया' का असली लाभ देश के आम नागरिक तक भी पहुंच सके।

(Shubhankar Mishra)

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